मुख्य तथ्य
- समूह की शुरुआत
- जनवरी 2025
- पहली मुलाकात में उपस्थिति
- 15 लोग
- कुल मुलाकातें
- 50 से अधिक
- ऑनलाइन सदस्य
- 650 से अधिक
- एक सत्र में अधिकतम उपस्थिति
- 51 लोग
- श्रीनगर रीड्स की अवधि
- लगभग 3 वर्ष
पृष्ठभूमि
कश्मीर में सामूहिक पठन की परंपरा लगभग एक सदी पुरानी है। 1929 में फतेह कड़ल रीडिंग रूम पार्टी की स्थापना दो चचेरे भाइयों मोल्वी बशीरुद्दीन और नसीरुद्दीन ने की थी। यह एक तंग कमरा था, जो बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। युवा कश्मीरी यहां अविभाजित पंजाब से लाए गए समाचार पत्र पढ़ते थे और वैश्विक उपनिवेशवाद-विरोधी क्रांतियों पर चर्चा करते थे।
समय के साथ, यह रीडिंग रूम सार्वजनिक पुस्तकालयों में बदल गया, और फिर रेसीडेंसी रोड पर प्रसिद्ध कॉफी हाउस में, जहां कवि, पत्रकार और विचारक बहस करते थे। आतंकवाद के कारण कॉफी हाउस बंद होने के बाद, इंटरनेट का आगमन हुआ, लेकिन इसने लोगों को अलग-थलग कर दिया। अब, श्रीनगर के पार्कों में यह पुरानी सामूहिक प्रवृत्ति फिर से उभर रही है।
वर्तमान स्थिति
कश्मीर रीडर्स, श्रीनगर रीड्स, बुलेवार्ड रीड्स और झेलम रीड्स जैसे समूह नियमित रूप से पार्कों, नदी किनारों और डल झील के किनारे मिलते हैं। कश्मीर रीडर्स की शुरुआत जनवरी 2025 में अकीब बशीर और उनके दोस्त मुमिन ने की थी। पहली मुलाकात में 15 लोग आए थे, और अब समूह ने 50 से अधिक मुलाकातें आयोजित की हैं। इसके ऑनलाइन समुदाय में 650 से अधिक सदस्य हैं, जिनमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र, केरल का एक पाठक, और पुलवामा, कुलगाम, बारामुला और अनंतनाग से आने वाले युवा शामिल हैं।
समूह रविवार को पार्क में मिलता है, जहां सदस्य अपनी पसंद की किताबें पढ़ते हैं। पढ़ाई के बाद मुशायरा होता है, जहां सदस्य अपनी कविताएं सुनाते हैं। शाम को बोर्ड गेम खेले जाते हैं। सोमवार को ऑनलाइन चर्चा होती है, और हाल ही में एक सत्र में 51 प्रतिभागी शामिल हुए। श्रीनगर रीड्स, जो लगभग तीन साल से शनिवार को मिलता है, की शुरुआत दुबई स्थित सॉफ्टवेयर इंजीनियर रिदवान-उल-हक ने की थी।
| विवरण | मान |
|---|---|
| पहली मुलाकात में उपस्थिति | 15 |
| कुल मुलाकातें | 50+ |
| ऑनलाइन सदस्य | 650+ |
| एक सत्र में अधिकतम उपस्थिति | 51 |
प्रभाव
ये मंडलियां युवाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ने और ध्यान केंद्रित करने में मदद कर रही हैं। सीरत, जो एक महीने पहले जुड़ी थीं, ने कहा कि इन चर्चाओं ने उन्हें अपना 'रचनात्मक और बौद्धिक पक्ष' फिर से खोजने में मदद की। जुहैब, जो बारामुला से आते हैं, इन सत्रों को 'मानसिक शरण' कहते हैं। उन्होंने कहा, 'कश्मीर में युवा बहुत अकेलापन और चिंता लेकर चलते हैं, लेकिन यहां बैठकर एहसास होता है कि आप अकेले नहीं हैं।'
महिलाओं के लिए ये स्थान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि सार्वजनिक स्थानों पर उनकी उपस्थिति सीमित है। आनेला ने कहा कि महिलाएं शायद ही सड़कों या दुकानों पर इकट्ठा होती दिखती हैं। कश्मीर रीडर्स का मिश्रित-लिंग वातावरण महिलाओं को समान भागीदारी का अवसर देता है। मोनिसा ने कहा कि यह स्थान 'सुरक्षित और समान' है।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
इन मंडलियों का भविष्य कई कारकों पर निर्भर करता है। यदि सदस्यों की संख्या बनी रहती है और नए लोग जुड़ते रहते हैं, तो यह आंदोलन और मजबूत हो सकता है। हालांकि, चिल्लई कलां जैसी कठोर सर्दियों में पार्क में मिलना संभव नहीं होता, और ऐसे में इनडोर स्थानों की कमी एक चुनौती है।
यदि सार्वजनिक पुस्तकालयों को अधिक स्वागतयोग्य बनाया जाए, तो ये मंडलियां साल भर चल सकती हैं। लेकिन यदि सदस्यों की रुचि कम होती है या आयोजकों का उत्साह घटता है, तो यह आंदोलन फीका पड़ सकता है। फिर भी, आयोजकों का लक्ष्य स्पष्ट है: पढ़ने को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना।
स्रोत: kashmirlife.net



