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प्रवास और जागरूकता की कमी से कर्नाटक में ASDDO के उच्च आंकड़े

कर्नाटक में मसौदा स्तर पर लगभग हर पांचवां मतदाता ASDDO श्रेणी में है। स्थायी स्थानांतरण सबसे बड़ा कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रवास, जागरूकता की कमी और राजनीतिक उदासीनता इसके लिए जिम्मेदार हैं।

प्रवास और जागरूकता की कमी से कर्नाटक में ASDDO के उच्च आंकड़े
Graphic: Amrit Khabar NewsroomImage rights policy

मुख्य तथ्य

ASDDO में कुल मतदाता
1.10 करोड़ में से लगभग 65.39 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित
अनुपस्थित मतदाता
15.92 लाख
उत्तर प्रदेश में कटौती दर
19.09%
बेंगलुरु में ASDDO
सबसे अधिक, 54% से अधिक मतदाता ASDDO या अनमैप्ड
अन्य श्रेणी में मतदाता
5 लाख से अधिक (3 अगस्त तक)

पृष्ठभूमि

कर्नाटक में विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान मसौदा स्तर पर लगभग हर पांचवां मतदाता अनुपस्थित, स्थानांतरित, डुप्लिकेट, मृत और अन्य (ASDDO) श्रेणी में आ गया है। यह आंकड़ा देश में सबसे अधिक में से एक है।

SIR के तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है, जिसमें बूथ स्तर अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर सत्यापन कर रहे हैं। यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से देश भर में लागू की जा रही है।

वर्तमान स्थिति

कर्नाटक में 1.10 करोड़ मतदाताओं में से 65.39 लाख को स्थायी रूप से स्थानांतरित चिह्नित किया गया है, जो ASDDO सूची का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसके अलावा, 15.92 लाख मतदाताओं को अनुपस्थित चिह्नित किया गया है।

बेंगलुरु में सबसे अधिक ASDDO संख्या दर्ज की गई है, क्योंकि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को स्थायी रूप से स्थानांतरित या अप्राप्य चिह्नित किया गया है। वहीं, कोप्पल, रायचूर, कलबुर्गी और यादगीर जैसे जिले भी उच्च ASDDO आंकड़े दर्ज कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश ने 19.09% के साथ देश में सबसे अधिक मसौदा स्तर की कटौती दर्ज की है, जिसका श्रेय प्रवास को दिया जाता है। हालांकि, कर्नाटक के आंकड़े चरण II और III के राज्यों की तुलना में अधिक हैं।

विभिन्न राज्यों में मसौदा स्तर की कटौती दर
राज्य कटौती दर (%)
उत्तर प्रदेश19.09
कर्नाटकलगभग 20 (अनुमानित)
हरियाणाकम
आंध्र प्रदेशकम
कर्नाटक का आंकड़ा अनुमानित है, क्योंकि स्रोत में सटीक प्रतिशत नहीं दिया गया है।

प्रभाव

ASDDO श्रेणी में चिह्नित मतदाताओं को अपना नाम बहाल करने के लिए अधिकारियों के पास जाना होगा या फॉर्म 6 जमा करना होगा। लेकिन कई प्रवासी मजदूरों को इस प्रक्रिया की जानकारी ही नहीं है, जिससे वे मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।

महिलाओं और अशिक्षित मजदूरों के लिए यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि उनके पास केवल आधार और राशन कार्ड हैं, जो सत्यापन के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कई मजदूरों को अपने नाम की वर्तनी भी नहीं आती।

राजनीतिक दलों ने बूथ स्तर एजेंट (BLA) नियुक्त किए हैं, लेकिन कई जिलों में वे सत्यापन के दौरान अनुपस्थित रहे। कांग्रेस और भाजपा ने प्रवासी समुदायों को जागरूक करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

भविष्य की संभावनाएं

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

यदि प्रवासी मजदूरों को जागरूक नहीं किया गया और सत्यापन प्रक्रिया में सुधार नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में वैध मतदाता मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। इससे आगामी चुनावों में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है।

यदि सरकार और चुनाव आयोग ASDDO सूची को सार्वजनिक करते हैं और दोबारा सत्यापन की अनुमति देते हैं, तो कई मतदाताओं के नाम बहाल हो सकते हैं। हालांकि, यह तभी संभव है जब राजनीतिक दल और प्रशासन मिलकर काम करें।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रवास के पैटर्न को ध्यान में रखते हुए नियमों में बदलाव किया जाता है, तो भविष्य में ऐसी समस्याओं से बचा जा सकता है। लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि प्रशासन इस दिशा में कोई कदम उठाएगा या नहीं।

स्रोत: thehindu.com

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