मुख्य तथ्य
- स्थान
- राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में राजस्थान-गुजरात सीमा पर
- ऐतिहासिक घटना
- नवंबर 1913 में ब्रिटिश सेना द्वारा गोलीबारी, लगभग 1,500 आदिवासियों की मौत
- मांग
- राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की लंबित मांग
- इनकार का कारण
- साइट पर आधुनिक निर्माण और विकास
- कानूनी प्रावधान
- AMASR अधिनियम, 1958
- वर्तमान स्थिति
- कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं
पृष्ठभूमि
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में राजस्थान-गुजरात सीमा पर स्थित मानगढ़ धाम आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। इसे अक्सर 'राजस्थान का जलियांवाला बाग' कहा जाता है। नवंबर 1913 में ब्रिटिश सेना ने सामाजिक सुधारक गोविंद गुरु के नेतृत्व में आदिवासियों पर गोलीबारी की थी, जिसमें लगभग 1,500 आदिवासियों के मारे जाने का अनुमान है।
मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग वर्षों से लंबित थी। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों का कहना था कि यह स्थल ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूर्व राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (NMA) अध्यक्ष तरुण विजय ने अपनी रिपोर्ट में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय दर्जा देने की सिफारिश की थी।
वर्तमान स्थिति
केंद्र सरकार ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने से इनकार कर दिया है। संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सांसद हनुमान बेनीवाल के प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 (AMASR अधिनियम) के तहत मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के संदर्भ/प्रतिनिधित्व पहले प्राप्त हुए थे।
मंत्री ने कहा कि साइट निरीक्षण में पाया गया कि स्थान पर काफी आधुनिक निर्माण और विकास हुआ है, जिसके कारण यह अधिनियम के प्रावधानों के तहत संरक्षण के लिए पात्र नहीं है। उन्होंने कहा, 'साइट निरीक्षण के आधार पर यह देखा गया है कि साइट पर काफी आधुनिक विकास और निर्माण हुआ है। इन व्यापक आधुनिक हस्तक्षेपों के कारण, साइट में पुरातात्विक विशेषताओं, प्रामाणिकता और अखंडता को बरकरार नहीं रखा गया है, जो AMASR अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में घोषणा के लिए आवश्यक है।' उन्होंने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| स्थान | बांसवाड़ा जिला, राजस्थान |
| घटना का वर्ष | 1913 |
| मृतकों की संख्या (अनुमानित) | 1,500 |
| नेता | गोविंद गुरु |
| संबंधित राज्य | राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश |
| अधिनियम | AMASR अधिनियम, 1958 |
प्रभाव
केंद्र के इस फैसले से आदिवासी नेताओं में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। बांसवाड़ा के सांसद राजकुमार रोत ने आदिवासी इतिहास की उपेक्षा के लिए लगातार सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, 'सरकार ने आदिवासियों को केवल वोट बैंक के रूप में देखा है। स्वतंत्रता संग्राम में हजारों आदिवासियों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उनकी विरासत का अपमान किया है।'
यह फैसला आदिवासी समुदायों की भावनाओं को आघात पहुंचा सकता है, जो मानगढ़ धाम को अपने बलिदान का प्रतीक मानते हैं। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों ने इस स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग की थी, जो अब पूरी नहीं हो सकी है।
भविष्य की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि केंद्र सरकार अपने फैसले पर कायम रहती है, तो मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलने की संभावना फिलहाल नहीं दिखती। हालांकि, आदिवासी नेताओं और सांसदों द्वारा लगातार दबाव बनाए जाने पर सरकार इस मामले पर पुनर्विचार कर सकती है।
यदि सरकार साइट के आधुनिक विकास को हटाने या संरक्षित करने के लिए कोई वैकल्पिक योजना बनाती है, तो भविष्य में इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जा सकता है। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाएगी या नहीं।
स्रोत: freepressjournal.in



