मुख्य तथ्य
- मामले का नाम
- सुनकोर बनाम बोल्डर
- सुनवाई की तारीख
- 5 अक्टूबर
- मुद्दा
- क्या संघीय कानून या संविधान स्थानीय सरकारों को जीवाश्म ईंधन कंपनियों पर मुकदमा करने से रोकता है
- समर्थन में याचिकाएं
- दो दर्जन से अधिक 'फ्रेंड ऑफ द कोर्ट' याचिकाएं स्थानीय सरकारों के पक्ष में
- ट्रम्प प्रशासन का रुख
- जीवाश्म ईंधन कंपनियों का पक्ष, 10 मिनट की बहस का समय मांगा
पृष्ठभूमि
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने नए कार्यकाल के पहले दिन, 5 अक्टूबर को, जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में मौखिक बहस की तारीख तय की। यह मामला 'सुनकोर बनाम बोल्डर' है, जिसमें अदालत को यह तय करना है कि संघीय कानून या संविधान स्थानीय सरकारों को जीवाश्म ईंधन कंपनियों पर जलवायु परिवर्तन से निपटने की लागत के लिए मुकदमा करने से रोकता है या नहीं।
इस मामले में दो न्यायाधीशों से खुद को अलग करने की मांग की गई है। न्यायमूर्ति सैमुअल अलिटो, जो जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में नियुक्त हुए थे और जिनके पास तेल कंपनियों में शेयर हैं, ने सरकारी निगरानी समूहों की ओर से अपनी वित्तीय हिस्सेदारी के कारण मामले से हटने की मांग को खारिज कर दिया है। वहीं, रूढ़िवादी समूहों ने न्यायमूर्ति एलेना कगन के खिलाफ जांच की मांग की है, क्योंकि उन्होंने एक न्यायिक संदर्भ पुस्तिका की प्रस्तावना लिखी थी, जिसमें जलवायु विज्ञान पर एक अध्याय शामिल था, जिसे बाद में हटा दिया गया।
वर्तमान स्थिति
इस मामले में शहरों, काउंटियों और राज्यों द्वारा दायर कई मुकदमे शामिल हैं, जिनमें ऊर्जा कंपनियों पर जनता को गुमराह करने का आरोप है। ऊर्जा उत्पादकों का कहना है कि इन मुकदमों की वजह से उन्हें अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।
सोमवार को स्थानीय सरकारों के समर्थन में दो दर्जन से अधिक 'फ्रेंड ऑफ द कोर्ट' याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें तर्क दिया गया कि ये मुकदमे राज्यों के नागरिकों की सुरक्षा के अधिकारों पर आधारित हैं। उद्योग और उसके सहयोगियों ने मई में भी इसी तरह का अभियान चलाया था, जब उद्योग ने सुप्रीम कोर्ट से इन मुकदमों को रोकने का अनुरोध किया था।
ट्रम्प प्रशासन, जो जीवाश्म ईंधन कंपनियों का पक्ष ले रहा है, ने बहस के लिए 10 मिनट का समय मांगा है। उप सॉलिसिटर जनरल सारा हैरिस ने अदालत से कहा कि ऐसे मुकदमे संघीय सरकार के संवैधानिक और वैधानिक कर्तव्यों में गंभीर रूप से हस्तक्षेप करते हैं।
प्रभाव
इस फैसले का असर देश भर में शहरों, काउंटियों और राज्यों द्वारा दायर कई जलवायु मुकदमों पर पड़ सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट स्थानीय सरकारों के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो ये मुकदमे आगे बढ़ सकते हैं, जिससे ऊर्जा कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
वहीं, अगर अदालत कंपनियों के पक्ष में जाती है, तो स्थानीय सरकारों को जलवायु परिवर्तन से निपटने की लागत वसूलने के लिए कानूनी रास्ते बंद हो सकते हैं। इसका असर पर्यावरण नीतियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
भविष्य का परिदृश्य
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
अदालत 5 अक्टूबर को मौखिक बहस सुनेगी, और फैसला आने में कई महीने लग सकते हैं। यदि अदालत स्थानीय सरकारों के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो ये मुकदमे आगे बढ़ सकते हैं और ऊर्जा कंपनियों को भारी मुआवजा देना पड़ सकता है।
यदि अदालत कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो स्थानीय सरकारों के लिए जलवायु मुकदमों का रास्ता बंद हो सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों पर असर पड़ सकता है। यह भी संभावना है कि अदालत मामले को आंशिक रूप से स्वीकार करे या किसी अन्य मुद्दे पर सीमित फैसला दे, जिससे आगे की कानूनी लड़ाई जारी रह सकती है।
स्रोत: eenews.net



