मुख्य तथ्य
- तारीख
- 4 अगस्त 2026
- अदालत
- सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ
- मुख्य न्यायाधीश
- सूर्यकांत
- विरोध प्रदर्शन की तारीख
- 20 जुलाई
- स्थान
- जंतर-मंतर, दिल्ली
- अगली सुनवाई
- 18 अगस्त
पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि दिल्ली सरकार और अन्य राज्य सरकारें हालिया विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को बंद करने के लिए कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं, जिनमें दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन भी शामिल हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि उसका 28 जुलाई का आदेश, जिसमें 'आपराधिक पृष्ठभूमि' वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी, केवल गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपी लोगों के लिए था।
वर्तमान स्थिति
यह स्पष्टीकरण उस समय आया जब अदालत नीट परीक्षा पेपर लीक मुद्दे पर 20 जुलाई को जंतर-मंतर और अन्य स्थानों पर हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ अत्यधिक पुलिस कार्रवाई के आरोपों वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। घायल पुलिस कर्मियों के परिवारों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें पुलिस अधिकारियों पर हमले के आरोपी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सरकार छात्रों के खिलाफ मामले वापस लेने के अपने आश्वासन पर कायम है, लेकिन कानूनी शब्दावली को लेकर भ्रम है। उन्होंने कहा कि आपराधिक कानून में एफआईआर वापस लेने का प्रावधान नहीं है और उचित तरीके में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करना, अभियोजन वापस लेना या कार्यवाही रद्द करने के लिए सक्षम अदालत का दरवाजा खटखटाना शामिल हो सकता है।
प्रभाव
इस स्पष्टीकरण से उन छात्रों को राहत मिल सकती है जो नीट पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन में शामिल थे और जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। राज्य सरकारें अब कानूनी रूप से उचित तरीके से इन मामलों को बंद कर सकती हैं।
हालांकि, जिन छात्रों पर गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोप हैं, उन पर यह छूट लागू नहीं होगी। पुलिस कर्मियों पर हमले के आरोपी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रह सकती है।
आगे की संभावनाएं
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
अदालत ने कहा कि वह पेलट गन के इस्तेमाल की परिस्थितियों और तरीके को नियंत्रित करने के लिए एक प्रोटोकॉल तैयार करेगी। यदि यह प्रोटोकॉल लागू होता है, तो भविष्य में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग के नियम स्पष्ट हो सकते हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि वह पुलिस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित करने या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति नियुक्त करने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है, तो पुलिस अत्याचार के आरोपों की स्वतंत्र जांच हो सकती है। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।
स्रोत: thenorthlines.com



