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केरल में मानसून भूस्खलन: एक व्याख्या

केरल में हर साल मानसून के दौरान भूस्खलन से कई लोगों की मौत होती है। 2024 में वायनाड में आए विनाशकारी भूस्खलन में 231 लोग मारे गए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक वर्षा और मानवीय हस्तक्षेप इसकी मुख्य वजहें हैं।

केरल में मानसून के दौरान आने वाले भूस्खलन अब एक आवर्ती घटना बन गए हैं। पश्चिमी घाट की तलहटी में बसे इस राज्य में हर साल भूस्खलन से कई लोगों की जान जाती है। इस साल पहली बड़ी घटना वायनाड में कल्लाडी में निर्माणाधीन ट्विन टनल के प्रवेश द्वार पर हुई, जहां अत्यधिक वर्षा के कारण आए मलबे के बहाव में आठ लोगों की मौत हो गई। इसके बाद 31 जुलाई को इडुक्की और कोट्टायम में हुए भूस्खलन में चार लोगों की जान गई।

केरल में औसतन लगभग 3,000 मिमी वार्षिक वर्षा होती है, जो अक्सर असमान और उच्च तीव्रता वाली होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण ये घटनाएं और अधिक लगातार और चरम होती जा रही हैं। राज्य की खड़ी ढलानें, अपक्षयित मिट्टी और जटिल भूविज्ञान इसे भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं। 2018 में, असामान्य मानसून के कारण 4,728 भूस्खलन हुए, जिनमें 48 लोग मारे गए। 2019 में पुथुमाला और कवालाप्पारा भूस्खलन में क्रमशः 17 और 59 लोगों की मौत हुई।

2024 में वायनाड के मुंडक्कई और चूरलमाला गांवों में आया भूस्खलन राज्य के इतिहास का सबसे भयावह था, जिसमें 231 लोग मारे गए और 41 लोग लापता हैं। हालांकि अत्यधिक वर्षा इन आपदाओं का तत्काल कारण रही है, लेकिन भौगोलिक वितरण और मानवीय हस्तक्षेप भी संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। केरल में भूस्खलन की घटनाएं हिमालयी राज्यों की तुलना में कम हैं, लेकिन घनी आबादी और कमजोर क्षेत्रों में बसावट के कारण मौतों का अनुपात अधिक है।

केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, राज्य के लगभग 4.75% क्षेत्र को उच्च जोखिम वाला क्षेत्र घोषित किया गया है। लगभग 3,300 वर्ग किमी अत्यधिक संवेदनशील और 2,886 वर्ग किमी मध्यम रूप से संवेदनशील है। विशेषज्ञों का कहना है कि 24 घंटे में 204 मिमी से अधिक वर्षा होने पर खतरा बढ़ जाता है। राज्य को अत्यधिक वर्षा की सटीक भविष्यवाणी, क्षेत्र-विशिष्ट चेतावनी, और भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण और कृषि गतिविधियों पर सख्त नियमों की आवश्यकता है।

स्रोत: thehindu.com

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