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पारिवारिक न्यायालय माता के अंतरिम अभिरक्षा के मुख्य प्रार्थना को छोड़कर केवल भेंट का अधिकार नहीं दे सकता: झारखंड उच्च न्यायालय

झारखंड उच्च न्यायालय ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय को माता के अंतरिम अभिरक्षा के मुख्य प्रार्थना को पहले खारिज करना होगा, उसके बाद ही वैकल्पिक भेंट का अधिकार दे सकता है। न्यायालय ने माता को अस्थायी अभिरक्षा सौंपने का आदेश दिया।

पारिवारिक न्यायालय माता के अंतरिम अभिरक्षा के मुख्य प्रार्थना को छोड़कर केवल भेंट का अधिकार नहीं दे सकता: झारखंड उच्च न्यायालय
Graphic: Amrit Khabar NewsroomImage rights policy

मुख्य तथ्य

मामला संख्या
First Appeal (Filing) No. 2181 of 2026
पीठ
न्यायमूर्ति सुजित नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद
पारिवारिक न्यायालय का आदेश
20 नवंबर 2025
माता का निवास
सारण, बिहार
बच्ची का जन्म
जुलाई 2021
विवाह
जनवरी 2017

पृष्ठभूमि

झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब किसी माता-पिता की याचिका में अंतरिम अभिरक्षा की मुख्य प्रार्थना और भेंट का अधिकार की वैकल्पिक प्रार्थना शामिल हो, तो पारिवारिक न्यायालय को पहले मुख्य प्रार्थना पर विचार कर उसे ठोस कारणों से खारिज करना होगा, उसके बाद ही वैकल्पिक राहत पर आगे बढ़ना चाहिए।

यह मामला एक माता की ओर से दायर अपील से उत्पन्न हुआ, जिसमें उसने अपनी नाबालिग बेटी की अंतरिम अभिरक्षा मांगी थी। पारिवारिक न्यायालय ने उसे केवल सीमित भेंट का अधिकार दिया था, जिसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

वर्तमान स्थिति

न्यायमूर्ति सुजित नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने पारिवारिक न्यायालय के 20 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें माता को हर दो महीने में दो से तीन घंटे के लिए बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई थी। साथ ही, सप्ताहांत पर आधे घंटे की वर्चुअल बातचीत की भी अनुमति दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने पाया कि पारिवारिक न्यायालय ने माता की अंतरिम अभिरक्षा की मुख्य प्रार्थना पर विचार किए बिना सीधे वैकल्पिक प्रार्थना पर फैसला सुनाया, जो कानून के अनुसार सही नहीं है। न्यायालय ने कहा कि बच्चे की भलाई ही सर्वोपरि है, न कि माता-पिता के कानूनी अधिकार।

मामले की मुख्य तिथियाँ
घटना तिथि
विवाहजनवरी 2017
बेटी का जन्मजुलाई 2021
माता का मायके जानाअगस्त 2024
पारिवारिक न्यायालय का आदेश20 नवंबर 2025
उच्च न्यायालय का निर्णय2026
तिथियाँ स्रोत से ली गई हैं।

प्रभाव

इस निर्णय का सीधा प्रभाव मामले की माता पर पड़ा है, जिसे अब अपनी बेटी की अस्थायी अभिरक्षा मिल गई है। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि बच्ची की अभिरक्षा माता को सौंपी जाए, जो अंतिम अभिरक्षा मामले के निपटारे तक प्रभावी रहेगी।

यह निर्णय अन्य समान मामलों में भी मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित कर सकता है, जहां पारिवारिक न्यायालयों को मुख्य प्रार्थना को नजरअंदाज करके वैकल्पिक राहत देने से बचना होगा। इससे उन माता-पिता को राहत मिल सकती है जो अंतरिम अभिरक्षा की मांग करते हैं।

भविष्य की संभावनाएं

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

यदि पारिवारिक न्यायालय इस निर्णय का पालन करते हुए मुख्य प्रार्थना पर पहले विचार करेंगे, तो ऐसे मामलों में तेजी से निपटारा हो सकता है और माता-पिता को उचित राहत मिल सकती है। हालांकि, यह देखना होगा कि क्या यह निर्णय सभी राज्यों में समान रूप से लागू होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उच्च न्यायालयों में इसी तरह के निर्णय आते रहे, तो अंतरिम अभिरक्षा के मामलों में अधिक संवेदनशीलता और बच्चे की भलाई को प्राथमिकता दी जाएगी। फिर भी, अंतिम परिणाम अभिभावकत्व मामले के निपटारे पर निर्भर करेगा।

स्रोत: livelaw.in

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स्रोत-समर्थित
समयरेखा

मामले की समयरेखा

  1. 01

    विवाह

    पक्षकारों का विवाह हुआ।

  2. 02

    बेटी का जन्म

    दंपति की बेटी का जन्म हुआ।

  3. 03

    माता का मायके जाना

    माता ने शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए मायके जाने का फैसला किया।

  4. 04

    पारिवारिक न्यायालय का आदेश

    पारिवारिक न्यायालय ने माता को केवल सीमित भेंट का अधिकार दिया।

  5. 05

    उच्च न्यायालय का निर्णय

    उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर माता को अस्थायी अभिरक्षा सौंपने का निर्देश दिया।

स्रोत:स्रोत: livelaw.in स्रोत-समर्थित

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