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कर्नाटक हाईकोर्ट ने पूछा- क्या पत्नी पति की सहमति के बिना डोनर स्पर्म से गर्भधारण कर सकती है?

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या विवाहित महिला तलाक की कार्यवाही के दौरान पति की सहमति के बिना डोनर स्पर्म से गर्भधारण कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि वह मातृत्व के अधिकार की रक्षा के विकल्पों पर विचार करेगा।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में विचार किया कि क्या एक विवाहित महिला, जिसके पति ने तलाक की याचिका दायर की है, उसकी सहमति के बिना डोनर स्पर्म की मदद से गर्भधारण कर सकती है, ताकि उसका मातृत्व का अधिकार सुरक्षित रह सके।

न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने 28 जुलाई को सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत पति को अपने संग्रहित शुक्राणु का उपयोग करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती, लेकिन यह जांच करेगी कि क्या कानून पत्नी के मातृत्व अधिकार की रक्षा के लिए डोनर स्पर्म जैसे वैकल्पिक उपायों की अनुमति देता है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता परवीज़ अहमद एमआर ने बताया कि दोनों पक्षों ने दूसरी शादी की थी और सात से आठ बार आईवीएफ कराया था। पति के पास पिछली शादी से बच्चा है, जबकि याचिकाकर्ता निःसंतान है। उन्होंने कहा कि पति की सहमति वापस लेने के कारण आईवीएफ आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

कोर्ट ने पूछा कि क्या पति की आपत्ति केवल अपने शुक्राणु के उपयोग को लेकर है या वह पत्नी के मातृत्व का विरोध करता है। न्यायमूर्ति ने कहा कि यदि पत्नी को डोनर से गर्भधारण की अनुमति दी जाती है, तो पति को बच्चे के भरण-पोषण या संपत्ति के दावों से मुक्त रखा जा सकता है।

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल साधना देसाई ने कहा कि ART अधिनियम केवल कमीशनिंग जोड़ों और पात्र अविवाहित महिलाओं को आईवीएफ की अनुमति देता है। उन्होंने कहा कि विधायी समर्थन के बिना ऐसी राहत देने से पितृत्व और जन्म पंजीकरण जैसे जटिल मुद्दे पैदा हो सकते हैं।

स्रोत: barandbench.com

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