मुख्य तथ्य
- तारीख
- 5 अगस्त 2019
- घटना
- अनुच्छेद 370 और 35A निरस्त
- आर्थिक नुकसान
- 9 अरब डॉलर से अधिक
- प्रभावित लोग
- 10 मिलियन से अधिक
- स्रोत
- द एक्सप्रेस ट्रिब्यून (पाकिस्तान)
पृष्ठभूमि
5 अगस्त 2019 को भारतीय संसद ने अनुच्छेद 370 और 35A को निरस्त कर दिया था, जिससे जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष दर्जा समाप्त हो गया। पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने इस कदम को 'अवैध कब्ज़ा' करार देते हुए कहा है कि यह भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।
संपादकीय में दावा किया गया है कि इस फैसले ने कश्मीरियों की सात दशकों से चली आ रही जनमत संग्रह की राजनीतिक लड़ाई को करारा झटका दिया है। इसमें कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित जनमत संग्रह के अधिकार को भारत ने कुचल दिया है।
वर्तमान स्थिति
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, 5 अगस्त 2019 के बाद से कश्मीरियों की जनसांख्यिकीय और सामाजिक-राजनीतिक पहचान को व्यवस्थित रूप से बदला गया है। संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि भारत ने डोमिसाइल, परिसीमन और विस्थापन के माध्यम से ज़मीनी हकीकत में हेरफेर किया है।
इसमें कहा गया है कि इससे 10 मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं और आर्थिक नुकसान 9 अरब डॉलर से अधिक हुआ है। संपादकीय में भारत पर क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को खतरे में डालने का भी आरोप लगाया गया है, जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई और सिंधु जल संधि को एकतरफा निलंबित करना शामिल है।
| विवरण | आंकड़ा |
|---|---|
| आर्थिक नुकसान | 9 अरब डॉलर से अधिक |
| प्रभावित लोग | 10 मिलियन से अधिक |
प्रभाव
संपादकीय के अनुसार, इस कदम ने कश्मीरियों की क्षेत्रीय स्वायत्तता और उनकी गहरी पहचान को नष्ट कर दिया है। इसमें कहा गया है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस 'असंवैधानिक' कृत्य को बरकरार रखना यह दर्शाता है कि नई दिल्ली कश्मीर में विद्रोह की वैधता को स्वीकार नहीं कर पाई है।
इसका सीधा असर कश्मीर के आम नागरिकों पर पड़ा है, जिन्हें आर्थिक नुकसान और विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है। संपादकीय में कहा गया है कि यह संकट नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के लोगों के लिए एक सक्रिय नीति की मांग करता है, ताकि मुक्ति और आत्मनिर्णय की लड़ाई पूरी हो सके।
भविष्य की संभावनाएँ
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
संपादकीय में कहा गया है कि दुनिया को भारत को यह समझाना होगा कि वह ऐसे 'ज़ेनोफोबिक' कदमों के लिए जवाबदेही से बच नहीं सकता। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय दबाव बनाता है, तो भारत को 5 अगस्त के फैसले को वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
हालांकि, यदि भारत अपने रुख पर कायम रहता है, तो क्षेत्रीय तनाव और बढ़ सकता है और कश्मीर में अस्थिरता जारी रह सकती है। संपादकीय में कहा गया है कि यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कश्मीरियों को उनका अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन इसका समाधान दोनों पक्षों की इच्छा पर निर्भर करेगा।
स्रोत: tribune.com.pk



