मुख्य तथ्य
- फिल्म
- रामायण: पार्ट 1
- निर्देशक
- नितेश तिवारी
- कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर
- रिम्पल और हरप्रीत नरूला
- सीता की भूमिका
- साई पल्लवी
- कैकेयी की भूमिका
- लारा दत्ता
- स्रोत
- वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस
पृष्ठभूमि
फिल्म 'रामायण: पार्ट 1' की रिलीज़ से पहले ही इसके कॉस्ट्यूम डिज़ाइन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। दर्शकों ने साई पल्लवी द्वारा निभाई गई सीता और लारा दत्ता द्वारा निभाई गई कैकेयी के समकालीन स्टाइल पर सवाल उठाए हैं। ट्रेलर में सीता के ब्लाउज़ डिज़ाइन से लेकर कैकेयी के हेयरस्टाइल और साड़ी तक, कई तत्वों ने ऑनलाइन बहस छेड़ दी है।
इस फिल्म का निर्देशन नितेश तिवारी ने किया है, और यह वाल्मीकि रामायण तथा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित है। इससे पहले रामानंद सागर की 1987 की टेलीविज़न श्रृंखला 'रामायण' को इस महाकाव्य का सबसे प्रतिष्ठित स्क्रीन रूपांतरण माना जाता है।
वर्तमान स्थिति
कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर रिम्पल और हरप्रीत नरूला, जो पहले 'पद्मावत' और 'हीरामंडी: द डायमंड बाज़ार' जैसी परियोजनाओं पर काम कर चुके हैं, ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए आलोचना का जवाब दिया। उन्होंने बताया कि रामायण के लिए कॉस्ट्यूम डिज़ाइन करना एक अनोखी चुनौती थी, क्योंकि उस युग के कपड़ों का कोई निश्चित दृश्य रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
रिम्पल ने कहा कि त्रेता युग के कपड़ों का कोई नमूना नहीं बचा है जिसे सीधे तौर पर दोबारा बनाया जा सके। उन्होंने कहा, 'शोध कॉस्ट्यूम डिज़ाइन की नींव है, लेकिन व्याख्या इसे कला बनाती है। उस काल के संरक्षित वस्त्र नहीं हैं जिन्हें हम आसानी से दोबारा बना सकें। हम सभी कैलेंडर आर्ट, लघु चित्रों, मंदिर की कल्पना और राजा रवि वर्मा की व्याख्याओं को देखकर बड़े हुए हैं।'
हरप्रीत ने कैकेयी के परिधान के रंगों के पीछे के विचार को समझाया। उन्होंने कहा, 'उनके (लारा दत्ता) परिधान में हरा रंग मातृत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि गहरा मैरून उस भावनात्मक ताकत और अंधकार को दर्शाता है जो उन्हें लेना है। वह अपने बेटे और राम के बीच फटी हुई हैं। हर रंग जानबूझकर चुना गया था।'
प्रभाव
इस बहस का असर फिल्म की रिलीज़ से पहले दर्शकों की उम्मीदों पर पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर कैकेयी के साड़ी, ब्लाउज़ और सैलून-जैसे हेयरस्टाइल की तुलना टेलीविज़न के पौराणिक शो के किरदारों से की जा रही है। इससे फिल्म निर्माताओं को अपने कलात्मक फैसलों का बचाव करना पड़ रहा है।
डिज़ाइनरों ने स्वीकार किया कि भारतीय दर्शकों के लिए रामायण जैसी परिचित कहानी पर काम करते समय आलोचना अपरिहार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि कॉस्ट्यूम को फिल्म के समग्र दृश्य जगत के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, न कि केवल अलग-अलग ट्रेलर फ्रेम के आधार पर आंका जाना चाहिए।
भविष्य की संभावनाएँ
विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।
यदि फिल्म की रिलीज़ के बाद कॉस्ट्यूम को समग्र कथा और दृश्य शैली के साथ देखा जाता है, तो आलोचना कम हो सकती है और दर्शकों की स्वीकार्यता बढ़ सकती है। हरप्रीत ने कहा, 'यह एक प्राचीन महाकाव्य को नई पीढ़ी से दृश्य रूप से बोलने का हमारा प्रयास है। हर धागे के पीछे सोच है। हम दर्शकों से अपील करना चाहते हैं, देखने से पहले फैसला न करें। इसे देखें, अनुभव करें, और फिर अपनी राय बनाएं।'
हालांकि, यदि दर्शक पारंपरिक चित्रण की उम्मीद करते हैं, तो विवाद जारी रह सकता है और फिल्म की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। यह स्पष्ट नहीं है कि फिल्म की रिलीज़ के बाद आलोचना किस हद तक कम होगी, लेकिन डिज़ाइनरों का मानना है कि फिल्म को पूरा देखने के बाद ही राय बनानी चाहिए।
स्रोत: mensxp.com



