भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। केंद्र सरकार के अनुसार, GI टैग उत्पादों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करता है, नकली उत्पादों पर रोक लगाता है और उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेहतर पहचान दिलाता है।
सरकार ने बताया कि GI टैग किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक क्षेत्र और पारंपरिक उत्पादन पद्धति से जोड़ता है। उदाहरण के तौर पर, बनारसी साड़ी को GI टैग मिलने से उसकी असली पहचान बनी रहती है, जिससे बुनकरों को बेहतर मूल्य और बाजार उपलब्ध होता है। वस्त्र मंत्रालय के अनुसार, GI टैग से ग्रामीण कारीगरों की आय में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।
सरकार के मुताबिक, भारत में 800 से अधिक GI उत्पाद पंजीकृत हैं और वर्ष 2014 के बाद 607 GI टैग प्रदान किए जा चुके हैं। जनवरी 2025 तक GI टैग के अधिकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़कर लगभग 29,000 हो गई है, जबकि पहले यह केवल 365 थी।
GI टैग वाले उत्पादों के निर्यात को भी बढ़ावा मिला है। वर्ष 2025 में मुजफ्फरनगर के GI टैग प्राप्त गुड़ का 30 मीट्रिक टन निर्यात बांग्लादेश किया गया, जिससे किसानों और उत्पादकों की आय में वृद्धि हुई।
भारत में GI उत्पादों के संरक्षण और पंजीकरण की व्यवस्था भौगोलिक संकेतक वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत की जाती है। वर्ष 2025 में नियमों में संशोधन कर GI आवेदन और अन्य प्रक्रियाओं की फीस में 80 प्रतिशत तक की कमी की गई है तथा नवीनीकरण शुल्क 3,000 रुपये से घटाकर 500 रुपये कर दिया गया है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश में 10,000 GI पंजीकरण सुनिश्चित करना है।
स्रोत: डीडी न्यूज़, प्रसार भारती



