मार्केट

बाज़ार डेटा लोड हो रहा है…

विलंबित भाव
लाइव टीवी
विदेश

अंगिका लोकगीतों में नारीवादी स्वर: बांका की महिलाओं के गीतों में प्रेम, विवाह और विद्रोह

बिहार के बांका जिले की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले अंगिका लोकगीत विवाह, दहेज और पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाते हैं। एक शोधकर्ता ने इन गीतों का दस्तावेजीकरण कर उन्हें डिजिटल मंचों पर साझा किया है।

मुख्य तथ्य

भाषा
अंगिका
क्षेत्र
बांका जिला, बिहार, भारत
दस्तावेजीकरण
2023-2024 में 75 अतिरिक्त लोक साहित्य अंश
मंच
विकिमीडिया कॉमन्स, विकिसोर्स
सहायता
लैंग्वेज रीवाइटलाईजेशन एक्सीलरेटर-विकिटंग्ज़

पृष्ठभूमि

अंगिका भाषा और संस्कृति मुख्य रूप से बिहार के बांका जिले और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित है। यहाँ की महिलाएं पीढ़ियों से अपने दुख-सुख, आक्रोश और उम्मीदों को लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त करती आई हैं। ये गीत न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि सामाजिक टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।

एक शोधकर्ता, जो स्वयं अंगिका भाषा की मूल वक्ता हैं, ने इन गीतों को रिकॉर्ड करने और उन्हें विकिमीडिया कॉमन्स और विकिसोर्स जैसे खुले ज्ञान प्लेटफार्मों पर अपलोड करने का कार्य शुरू किया है। उनका उद्देश्य अंगिका भाषा की डिजिटल उपस्थिति को बढ़ाना और इन गीतों को शोध के लिए उपलब्ध कराना है।

2023-2024 में, उन्हें लैंग्वेज रीवाइटलाईजेशन एक्सीलरेटर-विकिटंग्ज़ से सहायता मिली, जिससे वे लोक साहित्य के 75 अतिरिक्त अंशों का दस्तावेजीकरण कर सकीं। यह प्रयास अंगिका संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

वर्तमान स्थिति

बांका जिले की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले अंगिका लोकगीतों में विवाह व्यवस्था में विकल्प की कमी, विवाह के बाद ससुराल में महिलाओं की अधीनस्थ स्थिति और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई गई है। उदाहरण के लिए, गीत 'पापा जेठ बेसाख सादिया मत करिहो' में एक बेटी अपने पिता से सबसे गर्म महीनों में शादी न करने की विनती करती है, जबकि 'नदिया किनारे गे बेटी केकर बाजा बाजे छे' में एक बेटी शादी से बचने के लिए सुनहरे पिंजरे में छिपने की इच्छा जताती है।

विवाह के बाद की स्थिति को दर्शाते हुए, गीत 'नहर में साबुन खोना और इसके नतीजतन पति द्वारा पिटाई' में एक पत्नी अपनी भाभी से कहती है कि उसने साबुन खो दिया है और उसे डर है कि उसका पति उसे पीटेगा। यह गीत विवाहित महिला के पति के घर में हक की कमी और हिंसा के खतरे को उजागर करता है।

दहेज की मांग, हालांकि गैरकानूनी है, फिर भी शादी की बातचीत के दौरान की जाती है। गीत 'रिझी रिझी मांगे छे दहेजा' में बारिश का रूपक दहेज की मांग को दुल्हन के माता-पिता के जीवन पर आंधी के रूप में दर्शाता है। ये गीत महिलाओं की रोजमर्रा की वास्तविकता को दर्शाते हैं, जिनसे विवाह की प्रक्रिया में कोई राय नहीं ली जाती।

प्रभाव

इन लोकगीतों का दस्तावेजीकरण अंगिका भाषा और संस्कृति के संरक्षण में सहायक हो सकता है। ये गीत शोधकर्ताओं को क्षेत्र की महिलाओं के जीवन, उनके संघर्ष और उनकी सोच को समझने का एक अनूठा अवसर प्रदान करते हैं।

इन गीतों को डिजिटल प्लेटफार्मों पर उपलब्ध कराने से अंगिका भाषा की ऑनलाइन उपस्थिति बढ़ेगी, जिससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने में मदद मिल सकती है। साथ ही, ये गीत सामाजिक मुद्दों जैसे दहेज और घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने में भी सहायक हो सकते हैं।

हालांकि, इन गीतों का प्रभाव केवल सांस्कृतिक संरक्षण तक सीमित नहीं है। ये गीत महिलाओं की आवाज को मुखर करने का माध्यम बन सकते हैं, जिससे समाज में लैंगिक समानता की दिशा में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

भविष्य की संभावनाएं

विश्लेषणात्मक परिदृश्य: नीचे दी गई संभावनाएं निश्चित भविष्यवाणी नहीं हैं।

यदि इन लोकगीतों का दस्तावेजीकरण जारी रहता है और उन्हें व्यापक रूप से प्रसारित किया जाता है, तो अंगिका भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण सफलता मिल सकती है। इससे अन्य लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण के लिए भी एक मॉडल तैयार हो सकता है।

यदि इन गीतों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाता है, तो युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकती है और सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील बन सकती है। हालांकि, यह तभी संभव है जब सरकार और शैक्षणिक संस्थान इन प्रयासों को समर्थन दें।

वहीं, यदि इन गीतों को केवल डिजिटल प्लेटफार्मों तक सीमित रखा जाता है और स्थानीय समुदायों तक नहीं पहुंचाया जाता, तो उनका प्रभाव सीमित रह सकता है। इसलिए, इन गीतों को स्थानीय स्तर पर प्रचारित करने और लोक कलाकारों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

स्रोत: Debashish Chakrabarty / Global Voices हिंदी

इस समाचार को साझा करें